रामगंजमंडी। पंचायत समिति खेराबाद अब सवालों के घेरे में नहीं, बल्कि सीधे कटघरे में खड़ी है। वर्षों से मनरेगा और अन्य योजनाओं में धांधली की खबरें सामने आ रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर सिर्फ निरीक्षण और बयानबाज़ी हो रही है। हाल ही में लोकपाल जगदीश शर्मा ने कूदायला और खेराबाद पंचायत का निरीक्षण किया और जो सामने आया, वह चौंकाने वाला है।
कूदायला पंचायत में मनरेगा कार्यों में खामियाँ मिलीं, रजिस्टरों में जरूरी हस्ताक्षर नहीं मिले और कई रिकॉर्ड गायब पाए गए। सबसे बड़ा खुलासा तब हुआ जब पंचायत सहायक ने स्वीकार किया कि 2008 से ही मनरेगा के रजिस्टर गायब हैं और “तभी से ऐसा ही चल रहा है।”
यानी 18 साल से रिकॉर्ड नहीं… और किसी को फिक्र नहीं!
लोकपाल ने कनिष्ठ सहायक को रिकवरी के निर्देश दिए, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इतने वर्षों की गड़बड़ी सिर्फ एक कर्मचारी के सिर मढ़कर खत्म कर दी जाएगी? जिनके कार्यकाल में रिकॉर्ड गायब हुए, जिनकी निगरानी में भुगतान हुए—क्या वे जिम्मेदार नहीं?खेराबाद पंचायत में भी अनियमितताएँ मिलीं। क्षेत्र में नरेगा व अन्य योजनाओं में कथित भ्रष्टाचार पर लगातार खबरें छपती रही हैं, लेकिन लोकपाल ने मीडिया रिपोर्टों से अनभिज्ञता जताते हुए कहा“लिखित शिकायत दीजिए, तभी कार्रवाई होगी।”जब निरीक्षण में स्वयं अनियमितता स्वीकार रहे है, रिकॉर्ड गायब मिल रहे हैं, तो फिर लिखित शिकायत का बहाना क्यों?निरीक्षण के दौरान एक ग्रामीण ने पेड़ लगाने के कार्य में मनरेगा के दुरुपयोग और अन्य जनहित मुद्दों पर शिकायत की, लेकिन मौखिक शिकायत लेने से भी इनकार कर दिया गया।
क्या जनता की आवाज अब कागज़ के टुकड़े पर निर्भर है?अगर लोकपाल को निरीक्षण में “सब धांधली” दिख रही है, तो कार्रवाई के लिए अलग से आवेदन क्यों चाहिए?
क्या यह भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती है या सिस्टम की ढाल
क्या पंचायत समिति खेराबाद में गुम हुए रजिस्टरों के साथ जिम्मेदारी भी गुम हो गई है?या फिर यह पूरा खेल “औपचारिक निरीक्षण” के नाम पर लीपा-पोती है?अब समय है जवाब का क्योंकि जनता को सिर्फ दौरे नहीं, कार्रवाई चाहिए।





