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आरक्षण की लॉटरी खुलते ही जागी पंचायत: 7 साल बाद पीपलखेड़ी में शुरू हुआ निर्माण, ‘पति-ससुर राज’ पर भी उठे सवाल

On: October 5, 2026 5:15 AM
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महिला सशक्तिकरण का बना मज़ाक! पूर्व सरपंच रेखा लोधा, पंचायत चलाते रहे पति और ससुर; चुनाव आते ही चमकाने लगे छवि

झालावाड़.पंचायत राज चुनाव की आहट और आरक्षण लॉटरी जारी होते ही ग्राम पंचायत शोरती के पीपलखेड़ी गांव में अचानक विकास की रफ्तार तेज हो गई है। बालाजी मंदिर वाली गली, जहाँ पिछले करीब 3 सालों से ग्रामीण कीचड़ और गड्ढों से जूझ रहे थे, वहाँ अचानक इंटरलॉकिंग का काम शुरू कर दिया गया है। लेकिन इस निर्माण कार्य से ज्यादा चर्चा पंचायत के पिछले कार्यकाल में हावी रहे ‘सरपंच-पति और ससुर राज’ की हो रही है।ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि सरकार की जिस मंशा के तहत महिलाओं को पंचायती राज में आरक्षण देकर सशक्त बनाने की कोशिश की गई थी, शोरती पंचायत में उसकी धज्जियां उड़ाई गईं।

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शोरती पंचायत का कड़वा सच:

1. महिला सरपंच सिर्फ कागजों में, फैसले लेता रहा ससुर-पति का कुनबा? │ 2. 7 साल तक जनता परेशान रही, तब किस अधिकार से रोका गया काम? │ 3. चुनाव की तारीखें करीब आते ही अचानक बजट कहाँ से जारी हुआ?│

कागजों में रेखा लोधा,धरातल पर पति-ससुर का हुक्म

  • पिछल करीब 3 साल का इंतज़ार, अब चुनावी हड़बड़ी क्यों?

ग्राम पंचायत शोरती में पूर्व सरपंच रेखा लोधा थीं। नियमतः पंचायत का कामकाज, फैसले और जनसुनवाई सरपंच को खुद करनी चाहिए थी। लेकिन ग्रामीणों के अनुसार, पूरे कार्यकाल में सरपंच रेखा लोधा की जगह उनके पति और ससुर ही पंचायत का कामकाज संभालते रहे। प्रशासकीय बैठकों से लेकर विकास कार्यों के फैसलों तक, हर जगह पति और ससुर का ही हस्तक्षेप रहा। सरकार द्वारा महिलाओं को राजनीति और प्रशासन में आगे लाने की योजना शोरती पंचायत में पूरी तरह फीकी साबित हुई।

पीपलखेड़ी गांव के बालाजी मंदिर वाली गली गांव का मुख्य मार्ग है, जहाँ से मंदिर जाने वाले श्रद्धालुओं के साथ-साथ स्कूली बच्चों और ग्रामीणों की रोज आवाजाही होती है।सूत्रों माने तो पिछले करीब 3 वर्षों में कई बार इस रास्ते को पक्का कराने की मांग की गई, लेकिन पति-ससुर के कुनबे ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया। अब जैसे ही आरक्षण लॉटरी में स्थिति बदली और चुनाव की तारीखों का ऐलान होने की आहट हुई, तुरंत इंटरलॉकिंग की ईंटें गिरवा दी गईं। ग्रामीणों का सवाल है कि क्या यह विकास कार्य वाकई गाँव की भलाई के लिए हो रहा है या फिर अपनी राजनीतिक ज़मीन और वोट बैंक बचाने के लिए?सवाल यह हे को गांव में इंटरलॉकिंग काम की गुणवत्ता: चुनावी हड़बड़ी और आचार संहिता के डर में कराए जा रहे इंटरलॉकिंग कार्य की घटिया सामग्री की निष्पक्ष जांच हो।अब सवाल यह हे कि ‘सरपंच पति/ससुर’ द्वारा बिना अधिकार पंचायत चलाने और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर उच्च अधिकारियों द्वारा संज्ञान लिया जाए।अब देखना यह होगा कि क्या जिला प्रशासन इस ‘पति-ससुर राज’ और चुनावी टाइमिंग में हो रहे कार्यों का संज्ञान लेता है या ग्रामीण यूँ ही अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाने को मजबूर रहेंगे।

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