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शुद्ध आहार पर मिलावट का प्रहार,300 रुपये में शुद्ध देसी घी का मायाजाल।

On: October 9, 2026 7:09 AM
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दावों के चमचमाते रंगमंच के पीछे जहर खाने को मजबूर शहरवासी, डेयरी नाइस ब्रांड के सफेद कारोबार का चौंकाने वाला सच

झालावाड़। प्रदेश भर में ‘शुद्ध आहार, मिलावट पर वार’ और ‘शुद्ध राजनीति’ के बड़े-बड़े दावों का ढोल पीटा जा रहा है, लेकिन इन जगमगाती घोषणाओं के पीछे का कड़वा सच बेहद खौफनाक है। झालावाड़ के कोने-कोने में रोजाना आपकी सेहत के साथ वो घिनौना खेल खेला जा रहा है, जिसकी खुशबू में तो ‘डेयरी का स्वाद’ है, लेकिन असलियत में वह धीमी मौत का सामान है।

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बाजार में इन दिनों एक ऐसा ‘वंडर ब्रांड’ छाया हुआ है, जो आम आदमी के दिमाग और जेब दोनों को चकमा दे रहा । डेयरी नाइस’ (Dairy Nice)। डिब्बे पर बड़े-बड़े सुनहरे अक्षरों में छपा है: “शुद्ध देसी घी”। सरकारी मुहरें हैं, लाइसेंस का सुरक्षा कवच है और बिक्री की पूरी वैधानिकता है। लेकिन इस चमकदार रैपर के पीछे सबसे बड़ा सवाल यह कौंध रहा है, आखिर इस डिब्बे में घी कहाँ है? आज के दौर में जब दूध की कीमतें आसमान छू रही हैं, तब 300 रुपये लीटर में ‘शुद्ध देसी घी’ बेचना किसी चमत्कार से कम नहीं है! इस सफेद रंग के काले कारोबार की पूरी गणितीय कुंडली देखिए होलसेल सप्लाई कंपनी से होलसेल डीलर के पास यह माल महज 270 रुपये प्रति किलो (5% GST समेत) पहुँचता है। कंपनी के सेल्समैन इसे दुकानदारों को 300 से 325 रुपये में थमाते हैं । बेखबर ग्राहक तक यह ‘केमिकल और खुशबू का कॉकटेल’ 400 से 500 रुपये प्रति लीटर में परोसा जाता है।जब 1 किलो असली देसी घी बनाने में कम से कम 25 से 30 लीटर दूध लगता है, तो 270 रुपये में शुद्ध घी तैयार करना सिर्फ झांसा नहीं, सीधे-सीधे लोगों की सेहत के साथ संगठित खिलवाड़ है। असली घी के नाम पर मिलावटी घटिया सामग्री में घी का एसेंस (खुशबू) मिलाकर लाखों रुपये का यह व्यापार बेधड़क पनप रहा है।लाखों रुपये के इस काले कारोबार का जाल पूरे झालावाड़ जिले और प्रदेश भर में फैल चुका है। हर गली-मुहल्ले की परचून दुकान पर यह बांड खुलेआम बिक रहा है। ऐसे में सबसे तीखा और सीधा सवाल उठ रहा है:आखिर झालावाड़ के खाद्य सुरक्षा निरीक्षक (Food Inspector) की पैनी निगाहों से यह ब्रांड ओझल क्यों है? क्या सरकारी महकमे की यह खामोशी सिर्फ अनदेखी है, या फिर इस जहर के कारोबार को किसी शह का संरक्षण हासिल है?सरकारें बदलती हैं, दावे बदलते हैं, लेकिन झालावाड़ के बाशिंदे आज भी अपनी गाढ़ी कमाई देकर थाली में ‘जहर’ सजाने को मजबूर हैं। अब देखना यह है कि इस चौंकाने वाले खुलासे के बाद जिम्मेदार कुंभकर्णी नींद से जागते हैं या डेयरी नाइस का यह मायाजाल यूँ ही लोगों की जिंदगियों से खेलता रहेगा।

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