दुकानदारों के उड़े होश, रातों-रात गायब हो गया ‘डेयरी नाइस’ का जहर, अखबार की सुई चलते ही बिलों में दुबके मिलावटखोर
झालावाड़। कहते हैं कि सच की रोशनी जब पड़ती है, तो अंधेरे के सारे कारनामे खुद-ब-खुद दुम दबाकर भाग खड़े होते हैं—और झालावाड़ में कुछ ऐसा ही करिश्मा कर दिखाया है हमारी एक बेबाक पड़ताल ने! महज कुछ घंटे पहले जिस ‘डेयरी नाइस’ (Dairy Nice) नाम के ब्रांड ने 300 रुपये लीटर में ‘शुद्ध देसी घी’ बेचने का झंडा गाड़ रखा था और जिले के कोने-कोने में अपनी खुशबू बिखेर रहा था, अखबार के पन्नों पर उसका कच्चा-चिट्ठा आते ही बाजार में ऐसा भूचाल आया कि ‘न नौ मन तेल हुआ, न राधा नाची’ और देखते ही देखते सारा माल पलक झपकते ही फुर्र हो गया!

सुबह तक जो डिब्बे दुकानों की सबसे आगे वाली रैक पर शान से सजे थे, खबर छपते ही वे ऐसे गायब हुए जैसे गधे के सिर से सींग। जिन दुकानदारों के यहाँ यह घटिया सामग्री और एसेंस वाला सफेद कारोबार धड़ल्ले से चल रहा था, उनके चेहरों का रंग उड़ चुका है। अब वही दुकानदार जो इसे ‘असली और सबसे सस्ता घी’ बताकर ग्राहकों को बेच रहे थे, डर के मारे या तो डिब्बे अंदर तहखानों में छिपा चुके हैं या फिर ग्राहकों को यह कहकर टरका रहे हैं साहब! स्टॉक खत्म हो गया, कंपनी वाला आया ही नहीं l
सेल्समैन और होलसेलरों की नौ दो ग्यारह
जिस 270 रुपये किलो वाले ‘जहरीले गणित’ के दम पर यह व्यापार फल-फूल रहा था, उस रैकेट के सेल्समैन और डीलर भी अपने फोन बंद करके बिलों में जा घुसे हैं।बाजार से माल भले ही रातों-रात गायब हो गया हो, लेकिन झालावाड़ के जागरूक नागरिकों के जहन में अब भी बड़े सवाल सुलग रहे हैं:अखबार में खबर छपते ही रातों-रात गायब होने वाला यह माल आखिर झालावाड़ की सड़कों से कहाँ गया? क्या यह सिर्फ दुकानों से हटा है, या फिर इसे गोदामों में छिपाकर किसी नए कलेवर में दोबारा परोसने की तैयारी है?”झालावाड़ के खाद्य सुरक्षा विभाग और प्रशासन के लिए यह किसी खुली चुनौती से कम नहीं है। अब देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या विभाग इस ‘गायब खेल’ के पीछे छिपे असली चेहरों को बेनकाब कर पाएगा, या फिर मिलावटखोर कुछ दिन की खामोशी के बाद फिर से किसी नए नाम से जनता की सेहत पर डाका डालने लौट आएंगे।फिलहाल इतना तय है—सच का तड़का लगा, तो मिलावट के कारोबारियों की हवा टाइट हो गई.





