झालावाड़ का स्वास्थ्य भवन या जहर बेचेने वालो का संरक्षक।
झालावाड़ .शुद्ध आहार मिलावट पर वार सरकार का यह नारा इन दिनों विज्ञापनों में तो खूब चमक रहा है, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त इसके बिल्कुल उलट है. झालावाड़ से एक ऐसा सनसनीखेज और चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसे सुनकर आपके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी. यह कोई अटकलें नहीं, बल्कि पुख्ता दावे हैं कि मिलावट के इस काले खेल के तमाम डिजिटल सबूत खुद ज़िम्मेदार अधिकारियों के मोबाइल में कैद हैं. सूत्रों के हवाले से जो जानकारी सामने आई है, वह प्रदेश की खाद्य सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोलने के लिए काफी है। नियम चाहे अंतरराष्ट्रीय स्तर की बड़ी कंपनी के हों या किसी प्रांतीय ब्रांड के, झालावाड़ ज़िले में एंट्री का एक ही शॉर्टकट फॉर्मूला है. ज़िले में कोई भी कंपनी अपने प्रोडक्ट लॉन्च करने से पहले सीधे खाद्य निरीक्षक के दरबार में हाजिरी लगाती है।अधिकारियों के साथ सालाना या छमाही फिक्सिंग होने के बाद ही माल बाज़ार में उतरता है।डील तय होने के बाद शर्त यह होती है ,कि बाज़ार में सैंपलिंग नहीं होगी.अगर कभी शिकायत पर नमूना भर भी लिया गया, तो उसे लेबोरेटरी में पास करवाने की पूरी जिम्मेदारी खाद्य निरीक्षक की होती है , जिसके लिए अलग से बजट तय है.अगर इस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच करवा ली जाए,तो दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा. बस ज़रूरत है संबंधित अधिकारियों के मोबाइल नंबरों और व्हाट्स ऐप काल्स की गहनता से जांच करने की.जांच में अफसरों के फोन पर किसी न किसी कंपनी के वर्कर, डीलर या सेल्समैन के नंबर ज़रूर मिल जाएंगे। मोबाइल लोकेशन से यह भी साफ़ हो जाएगा कि साहब की साठगांठ किस किस प्रतिनिधि से कब कब और कहां हुई। झालावाड़ से लेकर पूरे प्रदेशभर में यह खेल लंबे समय से धड़ल्ले से जारी है.यहां तक कि नई भर्ती के ज़रिए महकमे में आए नए-नवेले कर्मचारियों को भी आते ही इसी सेटिंग की आग में झोंक दिया जा रहा है। कुल मिलाकर कहें तो जनता की थाली तक ज़हर पहुँचाने की परमिशन पिछले दरवाज़े से खुद सरकारी तंत्र ने दे रखी है.जनाब, महकमे के नुमाइंदों से सिर्फ कागज़ी और प्रेस नोट जारी करने की औपचारिकता से काम नहीं चलने वाला.साहब, आप दूध के धुले होने का दावा भले करते रहें, लेकिन पहले उस ज़हर को ईमानदारी से बंद करवाइए जो रोज़ाना आम जनता के घरों तक पहुँच रहा है।हमारा मकसद किसी को बदनाम करना नहीं, बल्कि सरकार की मंशा के अनुरूप मिलावटी खाद्य सामग्री की इस कालाबाज़ारी को हमेशा के लिए जड़ से उखाड़ फेंकना है। यह तो महज़ शुरुआत है.आगे-आगे देखिए, एक-एक खाद्य सामग्री की ऐसी पोल खुलेगी कि सिस्टम के होश उड़ जाएंगे। सरकारी अभियान में हमारा यह कड़ा प्रहार लगातार जारी रहेगा!सवाल यह नहीं है कि मिलावट कौन कर रहा है… सवाल यह है कि मिलावट करवाने की छूट किसकी शह पर मिल रही है?





